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अमेरिका-ईरान तनाव: युद्ध टालने के लिए कूटनीतिक कोशिशें तेज

ईरान-अमेरिका तनाव अपने चरम पर है, क्योंकि दोनों देशों के बीच सैन्य टकराव की आशंका बढ़ गई है। इस गंभीर स्थिति को देखते हुए, ईरान के पड़ोसी देशों समेत दुनिया के कई राष्ट्र युद्ध को टालने के लिए सघन कूटनीतिक प्रयास कर रहे हैं। इन प्रयासों का उद्देश्य दोनों पक्षों के बीच बढ़ते तनाव को कम करना और एक बड़े संघर्ष को रोकना है।

बुधवार को, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ईरान पर सैन्य हस्तक्षेप की अपनी धमकियों को दोहराया। उन्होंने कहा कि यदि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम और बैलिस्टिक मिसाइल क्षमता पर अंकुश लगाने के लिए कोई समझौता नहीं करता है, तो अमेरिका सैन्य कार्रवाई कर सकता है। इसके साथ ही, अमेरिकी नौसेना का एक बड़ा युद्धपोत बेड़ा, जिसमें परमाणु-संचालित विमानवाहक पोत यूएसएस अब्राहम लिंकन भी शामिल है, ईरान की ओर बढ़ रहा है। अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) ने पुष्टि की है कि इस बेड़े को मध्य पूर्व में क्षेत्रीय सुरक्षा और स्थिरता को बढ़ावा देने के लिए भेजा गया है।

दूसरी ओर, ईरान ने धमकी के तहत बातचीत करने से इनकार कर दिया है और अपनी रक्षा के लिए पूरी तरह से तैयार होने का संकेत दिया है। तेहरान ने मध्यस्थों के माध्यम से अमेरिका को संदेश भेजे हैं, लेकिन साथ ही अपनी रक्षा तैयारियों को भी मज़बूत किया है। गुरुवार को ईरानी सेना ने घोषणा की कि उसने अपने बेड़े में 1,000 नए “रणनीतिक” ड्रोन शामिल किए हैं। इन सबके बीच, ईरान तनाव को कम करने के लिए कूटनीतिक चैनलों का भी सक्रिय रूप से उपयोग कर रहा है।

अमेरिका की सैन्य कार्रवाई की धमकी

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने बुधवार को अपने ट्रुथ सोशल प्लेटफॉर्म पर एक पोस्ट में लिखा, “एक विशाल जहाजी बेड़ा ईरान की ओर बढ़ रहा है।” इस बेड़े में यूएसएस अब्राहम लिंकन भी शामिल है, जो अमेरिकी नौसेना के सबसे बड़े युद्धपोतों में से एक है। अमेरिकी सेंट्रल कमांड ने सोमवार को एक पोस्ट में पुष्टि की कि यूएसएस अब्राहम लिंकन को मध्य पूर्व भेजा गया है। यह पोत नवंबर में कैलिफोर्निया के सैन डिएगो से रवाना हुआ था और पिछले सप्ताह तक दक्षिण चीन सागर में तैनात था।

ट्रम्प ने इस महीने की शुरुआत में भी ईरान में चल रहे सरकार विरोधी प्रदर्शनों के दौरान सैन्य हस्तक्षेप की धमकी दी थी। ये विरोध प्रदर्शन दिसंबर 2025 के अंत में देश की खराब आर्थिक स्थितियों को लेकर शुरू हुए थे, जो बाद में 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद से सत्ता में मौजूद लिपिक नेतृत्व के लिए एक बड़ी चुनौती बन गए। ट्रम्प ने कहा था कि उन्होंने प्रदर्शनकारियों को मौत की सज़ा न दिए जाने के आश्वासन के बाद अपनी धमकी वापस ले ली थी, लेकिन अब उन्होंने इसे फिर से दोहराया है।

ईरान का सैन्य और कूटनीतिक जवाब

ईरान ने स्पष्ट किया है कि वह हमले की धमकी के बीच बातचीत के लिए तैयार नहीं है। ईरानी वार्ताकार टीम के एक वरिष्ठ सदस्य, काज़ेम ग़रीबाबादी ने बुधवार को ईरानी सरकारी मीडिया को बताया, “तेहरान की प्राथमिकता फिलहाल अमेरिका के साथ बातचीत करना नहीं, बल्कि अपने देश की रक्षा के लिए 200 प्रतिशत तैयार रहना है।” उन्होंने यह भी कहा कि मध्यस्थों के माध्यम से अमेरिका को संदेश भेजे गए हैं, लेकिन बातचीत के लिए अनुकूल परिस्थितियां बनने पर भी ईरान अपनी रक्षा के लिए पूरी तरह से तैयार रहेगा।

अपनी सैन्य तैयारियों को मज़बूत करते हुए, ईरानी सेना ने गुरुवार को 1,000 नए “रणनीतिक” ड्रोन शामिल करने की घोषणा की। सेना के कमांडर अमीर हमाती ने एक संक्षिप्त बयान में कहा, “हमारे सामने मौजूद खतरों के अनुपात में, सेना का एजेंडा किसी भी आक्रामकता का तेज़ी से मुकाबला करने और निर्णायक प्रतिक्रिया देने के लिए रणनीतिक लाभ बनाए रखना और सुधारना है।” इसके साथ ही, ईरान स्थिति को सामान्य करने के लिए कूटनीतिक रास्ते भी तलाश रहा है।

तनाव कम करने के लिए कूटनीतिक प्रयास

कई देश ईरान और अमेरिका के बीच तनाव को कम करने के लिए सक्रिय रूप से प्रयास कर रहे हैं। ईरान के विदेश मंत्री, अब्बास अराघची ने शुक्रवार को तुर्किये के विदेश मंत्री हाकन फिदान और राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन के साथ इस्तांबुल में उच्च-स्तरीय वार्ता की। ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा कि तेहरान साझा हितों के आधार पर पड़ोसियों के साथ संबंधों को मज़बूत करना चाहता है।

गुरुवार को, अराघची ने पाकिस्तानी विदेश मंत्री इशाक डार से फोन पर बात की। इसी दिन, पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियन से बात की और दोनों देशों के बीच संबंधों को मज़बूत करने की प्रतिबद्धता दोहराई। मिस्र के विदेश मंत्रालय ने भी बताया कि उसके शीर्ष राजनयिक बद्र अब्देलअत्ती ने क्षेत्र को अस्थिरता से बचाने के लिए अराघची और मध्य पूर्व के लिए अमेरिकी विशेष दूत स्टीव विटकॉफ से अलग-अलग बात की। मंगलवार को, सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने ईरानी राष्ट्रपति से कहा कि उनका देश ईरान के खिलाफ किसी भी सैन्य कार्रवाई के लिए अपने हवाई क्षेत्र या क्षेत्र का उपयोग करने की अनुमति नहीं देगा। संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने भी इसी तरह के संकल्प व्यक्त किए हैं।

भारत, चीन और रूस का रुख

भारत ने भी इस मामले में कूटनीतिक सक्रियता दिखाई है। बुधवार को, भारत के उप राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार, पवन कपूर ने तेहरान में ईरान की सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के सचिव अली लारीजानी और अंतर्राष्ट्रीय मामलों के उप-प्रमुख अली बघेरी कानी से मुलाकात की। पिछले हफ्ते, भारत ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (UNHRC) में ईरान के खिलाफ प्रदर्शनकारियों पर कार्रवाई की निंदा करने वाले प्रस्ताव के खिलाफ मतदान किया था। इस प्रस्ताव के विरोध में मतदान करने वालों में भारत के अलावा चीन, वियतनाम और क्यूबा भी शामिल थे।

चीन ने भी इस सप्ताह संयुक्त राष्ट्र में ईरान का समर्थन किया। संयुक्त राष्ट्र में चीन के स्थायी प्रतिनिधि फू कांग ने कहा, “बल प्रयोग से समस्याओं का समाधान नहीं हो सकता। कोई भी सैन्य दुस्साहस क्षेत्र को अप्रत्याशितता के रसातल में धकेल देगा।” वहीं, रूस ने गुरुवार को कहा कि अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत की गुंजाइश है। क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेसकोव ने सभी पक्षों से संयम बरतने का आग्रह किया।

पश्चिमी देशों की प्रतिक्रिया और नए प्रतिबंध

पश्चिमी देशों के नेताओं ने ज़्यादातर ईरान में प्रदर्शनकारियों पर हुई कार्रवाई की निंदा पर ध्यान केंद्रित किया है। 25 जनवरी को, फ्रांसीसी सशस्त्र बल मंत्री एलिस रूफो ने कहा कि सैन्य हस्तक्षेप “पसंदीदा विकल्प नहीं है।” हालांकि, बाद में फ्रांस ने अपनी नीति बदलते हुए ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) को यूरोपीय संघ की आतंकवादी संगठनों की सूची में शामिल करने का समर्थन किया।

गुरुवार को, यूरोपीय परिषद ने 15 ईरानी व्यक्तियों और छह संस्थाओं के खिलाफ नए प्रतिबंधों को अपनाया। यूरोपीय संघ ने IRGC को “आतंकवादी संगठन” भी नामित किया। बुधवार को, जब ट्रम्प ने अपनी धमकियां दोहराईं, तो जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मर्ज़ ने कहा कि ईरानी सरकार के “दिन गिने-चुने हैं”।

संक्षेप में, ईरान और अमेरिका के बीच सैन्य तनाव अपने उच्चतम स्तर पर है, जिसमें अमेरिका ने सैन्य कार्रवाई की धमकी दी है। इसके जवाब में, ईरान ने अपनी रक्षा तैयारियों को मज़बूत किया है, जबकि क्षेत्रीय और वैश्विक शक्तियां युद्ध को टालने के लिए गहन कूटनीतिक प्रयास कर रही हैं।

FAQs

अमेरिका ने ईरान के खिलाफ क्या सैन्य कदम उठाए हैं?

अमेरिका ने परमाणु-संचालित विमानवाहक पोत यूएसएस अब्राहम लिंकन सहित एक बड़ा नौसैनिक बेड़ा मध्य पूर्व में भेजा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ईरान पर सैन्य हस्तक्षेप की धमकी भी दी है।

ईरान ने अमेरिकी धमकियों पर क्या प्रतिक्रिया दी है?

ईरान ने धमकी के तहत बातचीत से इनकार कर दिया है और अपनी रक्षा के लिए पूरी तरह तैयार होने की बात कही है। इसके अलावा, ईरानी सेना ने अपने बेड़े में 1,000 नए रणनीतिक ड्रोन शामिल किए हैं।

कौन से देश तनाव कम करने की कोशिश कर रहे हैं?

तुर्किये, पाकिस्तान, मिस्र, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, भारत, चीन और रूस जैसे कई देश कूटनीतिक माध्यमों से तनाव को कम करने के प्रयास कर रहे हैं।

यूरोपीय संघ ने ईरान के खिलाफ क्या कार्रवाई की है?

यूरोपीय संघ ने 15 ईरानी व्यक्तियों और छह संस्थाओं पर नए प्रतिबंध लगाए हैं। इसके अतिरिक्त, उसने ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) को एक “आतंकवादी संगठन” के रूप में नामित किया है।

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद में ईरान पर प्रस्ताव को लेकर भारत का क्या रुख था?

भारत ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद में ईरान में प्रदर्शनकारियों पर कार्रवाई की निंदा करने वाले प्रस्ताव के खिलाफ मतदान किया था।

यह जानकारी केवल सामान्य जन-जागरूकता के उद्देश्य से प्रकाशित की गई है।

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