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ऑपरेशन सिंदूर: गुवाहाटी रिफाइनरी ने ही सेना को की थी धुआं रहित ईंधन की आपूर्ति

इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन (IOC) के स्वामित्व वाली गुवाहाटी रिफाइनरी ने गुरुवार को जानकारी दी कि उसने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान भारतीय सशस्त्र बलों को विशेष रूप से 19 हजार मीट्रिक टन (TMT) धुआं रहित ईंधन की आपूर्ति की है। यह विशेष ईंधन अत्यधिक ठंडी परिस्थितियों में सीमा पर तैनात सैनिकों को गर्म रखने के लिए विकसित किया गया था।

गुवाहाटी रिफाइनरी के कार्यकारी निदेशक सुनील कांति ने वरिष्ठ पत्रकारों के साथ बातचीत में बताया कि यह इकाई देश की उन चुनिंदा इकाइयों में से एक है जो लो सल्फर लो एरोमैटिक्स एसकेओ (LSLA SKO) का उत्पादन कर सकती है। ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान यह विशेष ईंधन प्रदान करने वाली यह एकमात्र इकाई थी, जिसने रिकॉर्ड समय के भीतर यह आपूर्ति पूरी की।

भारतीय सेना ने कुछ समय पहले रिफाइनरी से एक ऐसे विशेष ईंधन का उत्पादन करने का अनुरोध किया था जो जलने पर धुआं न छोड़े। इसके बाद, गुवाहाटी रिफाइनरी के अनुसंधान और विकास विंग ने ऊंचाई वाले स्थानों पर तैनात सशस्त्र बलों के लिए LSLA SKO विकसित किया। इस ईंधन को मिस्सामारी, सिलीगुड़ी और आगरा भेजा गया, जहाँ से इसे आगे सेना के ठिकानों तक पहुँचाया गया।

यह कदम भारत की रक्षा तैयारियों और ऊर्जा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। सार्वजनिक क्षेत्र की रिफाइनरियों द्वारा इस तरह की रणनीतिक आपूर्ति देश की आंतरिक क्षमताओं को भी उजागर करती है।

ऑपरेशन सिंदूर और विशेष ईंधन आपूर्ति

गुवाहाटी रिफाइनरी के कार्यकारी निदेशक-सह-रिफाइनरी प्रमुख, सुनील कांति ने बताया कि ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान रिफाइनरी ने अकेले ही 19 हजार मीट्रिक टन LSLA SKO का उत्पादन और आपूर्ति की। इस उत्पाद को मिस्सामारी से अरुणाचल प्रदेश, सिलीगुड़ी से सिक्किम और आगरा भेजे गए ईंधन को लद्दाख क्षेत्र में तैनात भारतीय सेना को आपूर्ति की गई। उन्होंने कहा कि यह गर्व की बात है कि गुवाहाटी रिफाइनरी ने देश की रक्षा प्रणाली में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

LSLA SKO ईंधन की खासियत

यह विशेष ईंधन, LSLA SKO, तकनीकी रूप से बहुत उन्नत है। इसमें सल्फर की मात्रा लगभग 1 पार्ट पर मिलियन (ppm) है, जबकि इसकी अनुमेय सीमा 10 ppm है। इसी तरह, इसमें एरोमैटिक्स की मात्रा 2-3% है, जिसकी ऊपरी सीमा 4% है, और इसका स्मोक पॉइंट 30 मिमी है। इन विशेषताओं के कारण, यह ईंधन जलने पर लगभग कोई धुआं उत्पन्न नहीं करता है, जो सामरिक दृष्टिकोण से बेहद महत्वपूर्ण है।

गुवाहाटी रिफाइनरी की क्षमता और विस्तार

गुवाहाटी रिफाइनरी देश की पहली सार्वजनिक क्षेत्र की इकाई है, जिसका उद्घाटन जनवरी 1962 में हुआ था। उस समय इसकी क्षमता 0.75 मिलियन मीट्रिक टन प्रति वर्ष (MMTPA) थी। साल 2023 में इसकी क्षमता को बढ़ाकर 1.2 MMTPA कर दिया गया। वर्तमान में, रिफाइनरी अपनी कच्चे तेल की आवश्यकता का लगभग 40% हिस्सा असम से और 60% आयातित कच्चे तेल से पूरा करती है। आयातित कच्चा तेल पारादीप के रास्ते बरौनी होते हुए आता है।

नई कैटेलिटिक रिफॉर्मिंग यूनिट

एक वरिष्ठ अधिकारी ने यह भी बताया कि गुवाहाटी रिफाइनरी एक कैटेलिटिक रिफॉर्मिंग यूनिट (CRU) का निर्माण कर रही है, जिसके इस साल मई तक चालू होने की उम्मीद है। वर्तमान में, रिफाइनरी के पास नेफ्था से रिफॉर्मेट (एक कम-सल्फर और उच्च-ऑक्टेन-नंबर वाला गैसोलीन मिश्रण घटक) का उत्पादन करने की सुविधा नहीं है और इसे अन्य रिफाइनरियों से आयात किया जाता है। आगामी 90 KTPA की क्षमता वाली CRU इकाई गुवाहाटी रिफाइनरी को भविष्य में गैसोलीन के उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाएगी।

गुवाहाटी रिफाइनरी द्वारा भारतीय सेना को विशेष ईंधन की सफल आपूर्ति और नई CRU इकाई के निर्माण की दिशा में प्रगति, देश की ऊर्जा सुरक्षा और रक्षा क्षमताओं को मजबूत करने में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका को दर्शाती है।

FAQs

गुवाहाटी रिफाइनरी ने भारतीय सेना को कौन सा विशेष ईंधन दिया?

गुवाहाटी रिफाइनरी ने भारतीय सेना को लो सल्फर लो एरोमैटिक्स एसकेओ (LSLA SKO) नामक एक विशेष धुआं रहित ईंधन की आपूर्ति की।

‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान कितनी मात्रा में ईंधन की आपूर्ति की गई?

‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान कुल 19 हजार मीट्रिक टन (TMT) LSLA SKO ईंधन की विशेष आपूर्ति की गई।

यह विशेष ईंधन क्यों महत्वपूर्ण है?

यह ईंधन जलने पर धुआं नहीं छोड़ता है और इसका उपयोग ऊंचाई वाले ठंडे सीमावर्ती क्षेत्रों में सैनिकों को गर्म रखने के लिए किया जाता है, जो सामरिक रूप से महत्वपूर्ण है।

गुवाहाटी रिफाइनरी की वर्तमान क्षमता कितनी है?

वर्ष 2023 में क्षमता वृद्धि के बाद गुवाहाटी रिफाइनरी की वर्तमान क्षमता 1.2 मिलियन मीट्रिक टन प्रति वर्ष (MMTPA) है।

रिफाइनरी में नई कैटेलिटिक रिफॉर्मिंग यूनिट (CRU) का क्या उद्देश्य है?

नई CRU इकाई का उद्देश्य गैसोलीन उत्पादन के लिए आवश्यक ‘रिफॉर्मेट’ का उत्पादन करना है, जिससे रिफाइनरी इस मामले में आत्मनिर्भर बन सकेगी।

यह जानकारी केवल सामान्य जन-जागरूकता के उद्देश्य से प्रकाशित की गई है।

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