भारत के चार नए लेबर कोड 21 नवंबर, 2025 को लागू होने के बाद आईटी उद्योग में दशकों का सबसे बड़ा बदलाव देखने को मिला है। इसका तत्काल प्रभाव देश की शीर्ष आईटी कंपनियों के वित्तीय वर्ष 2026 की तीसरी तिमाही के नतीजों में स्पष्ट रूप से दिखा, जब कई कंपनियों को कर्मचारी लाभों जैसे ग्रेच्युटी और अवकाश नकदीकरण के पुनर्मूल्यांकन के कारण महत्वपूर्ण एकमुश्त शुल्क दर्ज करना पड़ा।
सामूहिक रूप से, टीसीएस, इंफोसिस, एचसीएलटेक, विप्रो, टेक महिंद्रा और एलटीआईमाइंडट्री जैसी दिग्गज कंपनियों को कथित तौर पर 5,000 से 5,400 करोड़ रुपये के बीच का कुल वित्तीय बोझ उठाना पड़ा। इस वजह से उनकी तिमाही आय में एक उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई।
इन कंपनियों में, टीसीएस पर 2,128 करोड़ रुपये के वैधानिक शुल्क के साथ सबसे बड़ा भार पड़ा, जिसके परिणामस्वरूप उसके मुनाफे में साल-दर-साल 13.9 प्रतिशत की गिरावट आई। इंफोसिस ने 1,289 करोड़ रुपये का असाधारण शुल्क दर्ज किया, जिससे उसके शुद्ध लाभ में 2.2 प्रतिशत की कमी आई।
नए श्रम कानून, जो 29 पुराने केंद्रीय कानूनों को समेकित करते हैं, वेतन, काम के घंटे और कर्मचारियों के वर्गीकरण को नियंत्रित करने वाले नियमों में एक बड़ा संरचनात्मक परिवर्तन लाते हैं, जिसका सीधा असर आईटी क्षेत्र के परिचालन मॉडल पर पड़ रहा है।
आईटी कंपनियों पर वित्तीय प्रभाव
नए श्रम संहिताओं के लागू होने से भारत के आईटी उद्योग की शीर्ष कंपनियों को अपनी बैलेंस शीट पर भारी असर झेलना पड़ा है। वित्तीय वर्ष 2026 की तीसरी तिमाही में, इन कंपनियों ने कर्मचारी लाभों के पुनर्मूल्यांकन के लिए बड़े प्रावधान किए। टीसीएस ने 2,128 करोड़ रुपये का एकमुश्त वैधानिक शुल्क दर्ज किया, जिससे कंपनी के मुनाफे में 13.9% की वार्षिक गिरावट आई। इसी तरह, इंफोसिस ने ग्रेच्युटी और अवकाश देनदारियों के लिए अतिरिक्त 1,289 करोड़ रुपये का प्रावधान किया, जिसने उसके शुद्ध लाभ को 2.2% कम कर दिया। कुल मिलाकर, शीर्ष छह आईटी कंपनियों पर लगभग 5,400 करोड़ रुपये का असर पड़ा है।
वरिष्ठ अधिकारियों के बयान
परिणामों की घोषणा के दौरान, टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज के मुख्य वित्तीय अधिकारी, समीर सेकसरिया ने कहा, “हम उम्मीद करते हैं कि चल रहा प्रभाव न्यूनतम होगा, लगभग 10 से 15 आधार अंक।” उन्होंने आगे कहा, “हम किसी भी अतिरिक्त एकमुश्त शुल्क की उम्मीद नहीं करते हैं। जब तक कि नियमों में और स्पष्टता नहीं आती और किसी और मुद्दे को संबोधित करने की आवश्यकता नहीं होती।” इसी तरह, इंफोसिस के कार्यकारी उपाध्यक्ष और समूह सीएफओ, जयेश संघराजका ने कहा, “नियमों में बदलाव के आधार पर जो कुछ भी इस समय ज्ञात है, उसे इस तिमाही में दर्ज किया गया है। इसका आवर्ती प्रभाव लगभग 15 आधार अंक होगा।”
वेतन संरचना में महत्वपूर्ण बदलाव
नए नियमों के तहत सबसे बड़े बदलावों में से एक “वेतन” की नई, समान परिभाषा है। यह अनिवार्य करती है कि मूल वेतन कुल मुआवजे का कम से कम 50 प्रतिशत होना चाहिए। यह बदलाव भविष्य निधि और ग्रेच्युटी जैसे वैधानिक योगदानों के लिए आधार को बढ़ाता है, जिससे नियोक्ता की लागत बढ़ने की संभावना है, जबकि कुछ कर्मचारियों के हाथ में आने वाले वेतन में मामूली कमी हो सकती है। विशेषज्ञ स्टाफिंग फर्म एक्सफेनो के सह-संस्थापक कमल कारंथ के अनुसार, “कंपनियों को अगले मूल्यांकन चक्र में उच्च वेतन वृद्धि के माध्यम से आंशिक रूप से इसकी भरपाई करनी पड़ सकती है।”
काम के घंटे और ओवरटाइम के नए नियम
नए कोड काम के घंटे, ओवरटाइम और शिफ्ट डिजाइन से संबंधित नियमों को भी सख्त करते हैं। ये सभी उस उद्योग के लिए महत्वपूर्ण हैं जो 24×7 वैश्विक डिलीवरी मॉडल पर निर्भर करता है। अब काम के दिन 8 से 12 घंटे तक बढ़ाए जा सकते हैं, लेकिन साप्ताहिक सीमा 48 घंटे ही रहेगी। ओवरटाइम के लिए सामान्य दर से दोगुनी दर पर भुगतान करना अनिवार्य कर दिया गया है। इन बदलावों से कंपनियों के परिचालन खर्च में वृद्धि हो सकती है और उन्हें विशेष रूप से बीपीओ और रात की पाली वाले वातावरण में शिफ्ट गवर्नेंस को फिर से डिजाइन करने की आवश्यकता होगी।
‘वर्कर’ की परिभाषा का विस्तार
वेतन के अलावा, नए लेबर कोड आईटी कंपनियों के स्टाफिंग के तरीके को भी मौलिक रूप से बदल रहे हैं। ‘वर्कर’ की विस्तारित परिभाषा के तहत, डेवलपर्स, एनालिस्ट्स, इंजीनियर्स और अन्य व्हाइट-कॉलर भूमिकाओं को भी ओवरटाइम वेतन, अनिवार्य आराम की अवधि और बेहतर अवकाश लाभों जैसे वैधानिक संरक्षणों के दायरे में लाया जा सकता है। यह पिछली व्यवस्था से एक बड़ा बदलाव है, जहां आईटी/आईटीईएस कंपनियों को राज्य के दुकान और प्रतिष्ठान अधिनियमों के तहत व्यापक छूट प्राप्त थी।
अनुबंध और फिक्स्ड-टर्म कर्मचारियों पर असर
नए श्रम संहिताओं के तहत, फिक्स्ड-टर्म कर्मचारियों सहित सभी श्रमिकों को औपचारिक नियुक्ति पत्र मिलना चाहिए और कई मामलों में, स्थायी कर्मचारियों के बराबर लाभ भी प्राप्त होने चाहिए। यह बदलाव उस आईटी क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण है जो अनुबंध और प्रोजेक्ट-आधारित कर्मचारियों पर बहुत अधिक निर्भर है। जेफरीज ने एक रिपोर्ट में बताया कि भारतीय कर्मचारी लागत में 2 प्रतिशत की वृद्धि से वित्तीय वर्ष 2027 के आय अनुमानों पर असर पड़ सकता है, हालांकि कंपनियां वरिष्ठ स्तरों पर वेतन वृद्धि को सीमित करके इस प्रभाव को कम कर सकती हैं।
नए श्रम कानूनों ने आईटी क्षेत्र के लिए एक नई परिचालन वास्तविकता बनाई है। कंपनियों को तत्काल वित्तीय समायोजन करने पड़े हैं और अब उन्हें अपनी मुआवजा संरचनाओं, कार्यबल प्रबंधन और अनुपालन रणनीतियों में दीर्घकालिक बदलावों के लिए तैयारी करनी होगी।
FAQs
नए लेबर कोड कब लागू हुए?
भारत के चार नए लेबर कोड 21 नवंबर, 2025 को लागू हुए।
आईटी कंपनियों पर तत्काल वित्तीय प्रभाव क्या था?
वित्तीय वर्ष 2026 की तीसरी तिमाही में, शीर्ष आईटी कंपनियों को कर्मचारी लाभों के पुनर्मूल्यांकन के कारण सामूहिक रूप से 5,000 से 5,400 करोड़ रुपये के बीच एकमुश्त शुल्क दर्ज करना पड़ा।
वेतन की नई परिभाषा क्या है?
नए नियमों के अनुसार, किसी कर्मचारी का मूल वेतन उसके कुल मुआवजे का कम से कम 50 प्रतिशत होना अनिवार्य है, जिससे पीएफ और ग्रेच्युटी जैसे योगदानों का आधार बढ़ जाता है।
‘वर्कर’ की परिभाषा में क्या बदलाव आया है?
‘वर्कर’ की परिभाषा का विस्तार किया गया है, जिसके तहत अब डेवलपर्स, इंजीनियरों और विश्लेषकों जैसी व्हाइट-कॉलर भूमिकाओं को भी ओवरटाइम वेतन जैसे वैधानिक संरक्षण के दायरे में लाया जा सकता है।
ओवरटाइम के लिए नया नियम क्या है?
नए कोड के तहत, ओवरटाइम के लिए कर्मचारी को उसकी सामान्य वेतन दर से दोगुनी दर पर भुगतान करना अनिवार्य है।
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