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उर्दू प्रेस: भारत ट्रंप के ‘बोर्ड ऑफ पीस’ को नकारे, चुनाव आयोग की प्रक्रिया पारदर्शी बने

देश के उर्दू दैनिकों में इस सप्ताह भू-राजनीति और अंतरराष्ट्रीय व्यापार से जुड़े मुद्दे प्रमुखता से छाए रहे। स्विट्जरलैंड के दावोस में आयोजित विश्व आर्थिक मंच (WEF) में दिए गए दो महत्वपूर्ण भाषणों से लेकर देश में एक बड़े व्यापारिक समझौते की तैयारियों तक, इन प्रकाशनों ने उन घटनाओं पर ध्यान केंद्रित किया जिनका भारत के भविष्य पर गहरा असर पड़ सकता है। इसमें अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के ‘बोर्ड ऑफ पीस’ प्रस्ताव और कनाडाई प्रधानमंत्री मार्क कार्नी के भाषण पर विशेष चर्चा की गई।

इसके अलावा, गणतंत्र दिवस समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में भाग लेने और भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते (FTA) को अंतिम रूप देने के लिए शिखर सम्मेलन में शामिल होने के लिए यूरोपीय संघ (EU) के नेताओं की नई दिल्ली यात्रा भी सुर्खियों में रही। साथ ही, देश के भीतर चुनाव आयोग द्वारा मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर चल रहे विवाद पर भी संपादकीय टिप्पणियाँ की गईं।

इन चर्चाओं ने वैश्विक मंच पर भारत की भूमिका और घरेलू लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं की चुनौतियों को एक साथ उजागर किया। एक ओर जहाँ वैश्विक व्यवस्था में बदलाव के संकेत मिल रहे हैं, वहीं दूसरी ओर देश की चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल उठाए जा रहे हैं।

विश्व आर्थिक मंच और वैश्विक व्यवस्था

विश्व आर्थिक मंच की बैठक के दौरान दो भाषण विशेष रूप से चर्चा का केंद्र बने। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने गाजा शांति योजना के हिस्से के रूप में ‘बोर्ड ऑफ पीस’ शुरू करने का प्रस्ताव रखा, जो इजरायल-हमास युद्ध में संघर्ष विराम के बाद आया है। संपादकीय विश्लेषणों के अनुसार, ट्रंप का यह कदम संयुक्त राष्ट्र जैसे स्थापित बहुपक्षीय संस्थानों को चुनौती देने वाला हो सकता है।

इसी मंच पर, कनाडाई प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने अपने संबोधन में मौजूदा अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में संकट को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि दुनिया एक बदलाव के दौर से नहीं, बल्कि एक बिखराव के दौर से गुजर रही है। उन्होंने मध्यम शक्तियों से एकजुट होने का आग्रह किया, क्योंकि नियम-आधारित व्यवस्था का पतन हो रहा है।

ट्रंप का ‘बोर्ड ऑफ पीस’ प्रस्ताव

हैदराबाद से प्रकाशित एक दैनिक ने 23 जनवरी के अपने संपादकीय में डोनाल्ड ट्रंप के ‘बोर्ड ऑफ पीस’ प्रस्ताव पर टिप्पणी की। इसके अनुसार, राष्ट्रपति ट्रंप ने कई देशों को इस बोर्ड में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया है, लेकिन 1 बिलियन अमेरिकी डॉलर का योगदान देकर इसकी स्थायी सदस्यता हासिल की जा सकती है, जबकि बिना योगदान के केवल तीन साल की नियुक्ति का प्रावधान है। इसे ट्रंप की “व्यावसायिक मानसिकता” का प्रतीक बताया गया है।

संपादकीय में कहा गया है कि इस बोर्ड का मूल उद्देश्य केवल गाजा तक सीमित न होकर अन्य वैश्विक संघर्षों के प्रबंधन के लिए एक नया अंतरराष्ट्रीय मंच बनाना प्रतीत होता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी इस बोर्ड में शामिल होने का निमंत्रण मिला है। भारत को यह तय करना होगा कि यह बोर्ड गाजा शांति के लिए एक पैनल है या वैश्विक व्यवस्था पर अमेरिकी नियंत्रण को मजबूत करने का एक उपकरण।

भारत के लिए रणनीतिक दुविधा

टिप्पणियों में कहा गया है कि भारत हमेशा से बहुपक्षवाद और संयुक्त राष्ट्र सुधारों का समर्थक रहा है। एक स्थिर और नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था ने हमेशा विकासशील देशों और मध्यम शक्तियों को लाभ पहुंचाया है। नई दिल्ली ने हमेशा सावधानीपूर्वक अपने हितों और रणनीतिक स्वायत्तता की नीति बनाए रखी है।

यह भी उल्लेख किया गया कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने नवंबर 2025 में अपने प्रस्ताव में 2027 तक गाजा पट्टी के पुनर्निर्माण के लिए एक बोर्ड के गठन को मंजूरी दी थी। संपादकीय में सुझाव दिया गया कि यदि ट्रंप का बोर्ड केवल गाजा में द्वि-राष्ट्र समाधान के संयुक्त राष्ट्र के जनादेश तक सीमित रहता है, तो भारत को इसमें शामिल होने में कोई समस्या नहीं हो सकती। हालांकि, यदि इसका दायरा अन्य संघर्षों तक बढ़ाया जाता है, तो यह भारत की नीति और रणनीतिक हितों को कमजोर कर सकता है।

कनाडाई प्रधानमंत्री का संबोधन

नई दिल्ली से प्रकाशित एक अन्य दैनिक ने 25 जनवरी के संपादकीय में कनाडाई प्रधानमंत्री मार्क कार्नी के भाषण पर प्रकाश डाला। राजनीति में आने से पहले, कार्नी एक प्रतिष्ठित टेक्नोक्रेट और सेंट्रल बैंकर के रूप में कई प्रमुख पदों पर कार्य कर चुके हैं। संपादकीय के अनुसार, 20 जनवरी, 2025 को अमेरिकी राष्ट्रपति के रूप में अपने दूसरे उद्घाटन के बाद से, ट्रंप ने अपनी नीतियों से दुनिया में उथल-पुथल मचा दी है।

इस पृष्ठभूमि में, कार्नी ने किसी का नाम लिए बिना कहा कि नियम-आधारित व्यवस्था के पतन ने एक ऐसी स्थिति पैदा कर दी है जहाँ “शक्तिशाली वह करते हैं जो वे कर सकते हैं और कमजोर वह सहते हैं जो उन्हें सहना चाहिए।” उन्होंने मध्यम शक्तियों से एकजुट होने का आग्रह करते हुए कहा, “अगर हम मेज पर नहीं हैं, तो हम मेनू पर हैं।” उनके इस भाषण को काफी सराहना मिली।

मतदाता सूची पुनरीक्षण पर विवाद

घरेलू मोर्चे पर, नौ राज्यों और तीन केंद्र शासित प्रदेशों में चुनाव आयोग द्वारा चल रहे मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) पर विवाद को भी उजागर किया गया। हैदराबाद के एक दैनिक ने अपने 22 जनवरी के संपादकीय में बताया कि यह प्रक्रिया पिछले साल जून में बिहार से शुरू होने के बाद से ही विवादास्पद रही है। इसे जल्दबाजी में किया गया, मनमाना और अपारदर्शी बताया गया है।

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने भी टिप्पणी की है कि SIR करने की चुनाव आयोग की शक्ति “असीमित नहीं है” और इसका प्रयोग “प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप” और “पारदर्शी” होना चाहिए। बिहार में इस प्रक्रिया के दौरान कई जीवित व्यक्तियों के नाम मृतकों की सूची में डाल दिए गए थे। उत्तर प्रदेश में ही विभिन्न आधारों पर लगभग 3 करोड़ मतदाताओं के नाम मसौदा सूची से हटा दिए गए हैं। संपादकीय में कहा गया कि चुनाव आयोग को अपनी कार्यप्रणाली की समीक्षा करनी चाहिए और इस प्रक्रिया को पारदर्शी और अचूक बनाने के लिए आवश्यक सुधार करने चाहिए।

उर्दू दैनिकों की टिप्पणियों में इस सप्ताह वैश्विक मंच पर भारत की बदलती भूमिका और घरेलू स्तर पर लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं की मजबूती से जुड़ी चिंताओं पर ध्यान केंद्रित किया गया। इन मुद्दों का भारत की विदेश नीति और आंतरिक स्थिरता पर दूरगामी प्रभाव पड़ सकता है।

FAQs

‘बोर्ड ऑफ पीस’ क्या है?

यह अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा प्रस्तावित एक अंतरराष्ट्रीय निकाय है, जिसे मूल रूप से गाजा शांति योजना के हिस्से के रूप में बनाया गया था। हालांकि, ऐसी चिंताएं हैं कि इसका उपयोग अन्य वैश्विक संघर्षों के प्रबंधन के लिए भी किया जा सकता है, जो संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाओं को चुनौती दे सकता है।

कनाडाई प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने क्या कहा?

मार्क कार्नी ने दावोस में विश्व आर्थिक मंच पर अपने भाषण में कहा कि दुनिया एक “बिखराव” के दौर से गुजर रही है, न कि “बदलाव” के। उन्होंने मध्यम शक्तियों से वैश्विक व्यवस्था में अपनी जगह बनाने के लिए एकजुट होने का आग्रह किया।

मतदाता सूची पुनरीक्षण (SIR) क्या है?

विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) भारत के चुनाव आयोग द्वारा मतदाता सूचियों को अद्यतन करने, त्रुटियों को दूर करने और यह सुनिश्चित करने के लिए चलाया जाने वाला एक अभियान है कि सूची में कोई भी अपात्र व्यक्ति शामिल न हो और कोई भी पात्र मतदाता छूट न जाए।

SIR को लेकर मुख्य विवाद क्या है?

इस प्रक्रिया को लेकर मुख्य विवाद यह है कि इसे जल्दबाजी में और अपारदर्शी तरीके से करने के आरोप लगे हैं। कई जगहों पर पात्र मतदाताओं के नाम गलत तरीके से सूची से हटा दिए जाने की शिकायतें सामने आई हैं, जैसे बिहार में जीवित लोगों को मृत घोषित करना।

इस पुनरीक्षण पर सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि मतदाता सूची का पुनरीक्षण करने की चुनाव आयोग की शक्ति असीमित नहीं है। इस शक्ति का प्रयोग पारदर्शी तरीके से और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप किया जाना चाहिए।

यह जानकारी केवल सामान्य जन-जागरूकता के उद्देश्य से प्रकाशित की गई है।

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