ओडिशा के सबसे बड़े महानदी जल विवाद ने एक बार फिर तूल पकड़ लिया है। बीजू जनता दल (BJD) ने राज्य और केंद्र की भाजपा सरकारों पर निष्क्रियता का आरोप लगाते हुए पूरे ओडिशा में विरोध प्रदर्शन की धमकी दी है। इसके साथ ही, 23 जनवरी को होने वाली एक सर्वदलीय बैठक को आखिरी समय में रद्द कर दिया गया, जिससे यह मुद्दा फिर से सुर्खियों में आ गया है।
महानदी को ओडिशा की जीवन रेखा माना जाता है। यह विवाद मुख्य रूप से ओडिशा और छत्तीसगढ़ के बीच पानी के बंटवारे को लेकर है। ओडिशा नदी के बहाव में निचले हिस्से में स्थित है, जबकि छत्तीसगढ़ ऊपरी हिस्से में है। ओडिशा का आरोप है कि छत्तीसगढ़ ने नदी पर एकतरफा बैराजों का निर्माण किया है, जिससे गैर-मानसून अवधि के दौरान राज्य में पानी का प्रवाह प्रभावित होता है।
यह विवाद वर्षों से चल रहा है और इसके समाधान के लिए कानूनी और राजनीतिक दोनों स्तरों पर प्रयास किए गए हैं। केंद्र सरकार ने इस मुद्दे को हल करने के लिए एक न्यायाधिकरण का भी गठन किया है, जिसका कार्यकाल हाल ही में बढ़ाया गया है। अब राज्य में सत्ता परिवर्तन के बाद, नई भाजपा सरकार इस मुद्दे को बातचीत के जरिए सुलझाने की कोशिश कर रही है, जबकि विपक्षी दल सरकार की मंशा पर सवाल उठा रहे हैं।
विवाद की पृष्ठभूमि और मुख्य कारण
महानदी जल विवाद का मुख्य कारण छत्तीसगढ़ द्वारा नदी के ऊपरी हिस्से में कई बैराजों का निर्माण करना है। ओडिशा ने आरोप लगाया है कि इन निर्माणों से शुष्क मौसम के दौरान महानदी में पानी का प्रवाह काफी कम हो गया है, जिससे राज्य की कृषि, उद्योग और पेयजल आपूर्ति पर गंभीर असर पड़ रहा है। ओडिशा, जो नदी के निचले हिस्से में है, अपने अधिकारों का दावा कर रहा है।
सितंबर 2016 में, केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने इस मुद्दे को हल करने के लिए एक त्रिपक्षीय बैठक बुलाई थी। इस बैठक में तत्कालीन केंद्रीय जल संसाधन मंत्री उमा भारती, ओडिशा के तत्कालीन मुख्यमंत्री नवीन पटनायक और छत्तीसगढ़ के तत्कालीन मुख्यमंत्री रमन सिंह शामिल हुए थे। हालांकि, यह बैठक बेनतीजा रही और पटनायक सरकार ने केंद्र पर छत्तीसगढ़ का पक्ष लेने का आरोप लगाया, क्योंकि उस समय छत्तीसगढ़ में भी भाजपा का शासन था।
कानूनी लड़ाई और न्यायाधिकरण का गठन
जब बातचीत से कोई समाधान नहीं निकला, तो ओडिशा सरकार ने इस मामले को कानूनी रास्ते पर ले जाने का फैसला किया। दिसंबर 2016 में, तत्कालीन BJD सरकार ने संविधान के अनुच्छेद 131 के तहत सुप्रीम कोर्ट में एक मूल मुकदमा दायर किया। इसमें छत्तीसगढ़ को नदी पर बैराजों का निर्माण करने से रोकने के लिए निषेधाज्ञा की मांग की गई थी।
इसके लगभग एक महीने पहले, ओडिशा ने अंतर-राज्यीय जल विवाद अधिनियम, 1956 के तहत केंद्र से एक न्यायाधिकरण के गठन की मांग करते हुए एक वैधानिक शिकायत भी दर्ज की थी। जनवरी 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को एक महीने के भीतर न्यायाधिकरण बनाने का निर्देश दिया, जिसे BJD ने अपनी “नैतिक जीत” बताया। इसके बाद, मार्च 2018 में केंद्र ने तीन सदस्यीय महानदी जल विवाद न्यायाधिकरण का गठन किया, जिसके अध्यक्ष सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन न्यायाधीश न्यायमूर्ति ए एम खानविलकर थे। इस पैनल का कार्यकाल कई बार बढ़ाया गया है और नवीनतम विस्तार अप्रैल 2026 तक है। न्यायमूर्ति खानविलकर के इस्तीफे के बाद, वर्तमान में इस समिति की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट की न्यायाधीश न्यायमूर्ति बेला त्रिवेदी कर रही हैं।
ओडिशा में नई सरकार का रुख
ओडिशा में सत्ता में आई नई भाजपा सरकार ने इस मुद्दे को सौहार्दपूर्ण ढंग से हल करने की अपनी पुरानी प्रतिबद्धता दोहराई है। मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी ने पिछले अगस्त में छत्तीसगढ़ के अपने समकक्ष विष्णु देव साय को पत्र लिखकर “पारस्परिक रूप से लाभकारी समाधान” की मांग की थी। इसके जवाब में, साय ने कहा कि प्रस्ताव “सक्रिय विचाराधीन” है।
माझी सरकार ने इस मुद्दे को हल करने के लिए एक उच्च-स्तरीय समिति का भी गठन किया है, जिसकी अध्यक्षता उपमुख्यमंत्री के वी सिंह देव कर रहे हैं। इस समिति में भाजपा, BJD और कांग्रेस के विधायक शामिल हैं। समिति को सरकार को मार्गदर्शन प्रदान करने का काम सौंपा गया है।
महानदी का महत्व
आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, महानदी का कुल जलग्रहण क्षेत्र 1,41,600 वर्ग किलोमीटर है, जिसका 53.9% हिस्सा छत्तीसगढ़ में और 45.73% हिस्सा ओडिशा में पड़ता है। यह नदी ओडिशा में कृषि, उद्योग और जलविद्युत उत्पादन के लिए पानी का एक प्रमुख स्रोत है। नदी से होने वाली भीषण बाढ़ को नियंत्रित करने के लिए 1953 में ओडिशा के संबलपुर जिले में हीराकुंड में 25 किलोमीटर लंबा विशाल मिट्टी का बांध बनाया गया था। यह बांध राज्य के पश्चिमी हिस्से में सिंचाई और बिजली उत्पादन के लिए पानी संग्रहीत करता है।
विपक्षी दलों की प्रतिक्रिया
BJD ने इस मुद्दे पर राज्य सरकार को घेरने की तैयारी कर ली है। पार्टी की राजनीतिक मामलों की समिति की बैठक के बाद, वरिष्ठ BJD नेता संजय दास बर्मा ने कहा कि पार्टी जल्द ही केंद्र की “साजिश” और माझी सरकार की “निष्क्रियता” को उजागर करने के लिए एक आंदोलन शुरू करेगी। वहीं, राज्य कांग्रेस अध्यक्ष भक्त चरण दास ने कहा है कि माझी के नेतृत्व वाली ओडिशा सरकार ने स्पष्ट रूप से दिखा दिया है कि वह जल विवाद को हल नहीं कर सकती।
महानदी जल विवाद एक बार फिर राजनीतिक केंद्र में है, जहां BJD विरोध प्रदर्शन की तैयारी कर रही है, वहीं राज्य की नई भाजपा सरकार बातचीत के माध्यम से समाधान खोजने का प्रयास कर रही है। इस बीच, कानूनी प्रक्रिया न्यायाधिकरण के माध्यम से जारी है, जिसका फैसला दोनों राज्यों के लिए महत्वपूर्ण होगा।
FAQs
महानदी जल विवाद किन दो राज्यों के बीच है?
यह जल विवाद मुख्य रूप से ओडिशा और छत्तीसगढ़ राज्यों के बीच है, क्योंकि ओडिशा नदी के निचले प्रवाह क्षेत्र में और छत्तीसगढ़ ऊपरी प्रवाह क्षेत्र में स्थित है।
ओडिशा का मुख्य आरोप क्या है?
ओडिशा का आरोप है कि छत्तीसगढ़ ने महानदी के ऊपरी हिस्से में एकतरफा कई बैराजों का निर्माण किया है, जिससे गैर-मानसून के मौसम में ओडिशा में पानी का प्रवाह कम हो गया है।
इस विवाद को सुलझाने के लिए कौन सा न्यायाधिकरण बनाया गया है?
इस विवाद को हल करने के लिए केंद्र सरकार ने मार्च 2018 में महानदी जल विवाद न्यायाधिकरण का गठन किया था।
महानदी ओडिशा के लिए क्यों महत्वपूर्ण है?
महानदी को ओडिशा की जीवन रेखा माना जाता है। यह राज्य में कृषि, सिंचाई, उद्योग और जलविद्युत उत्पादन के लिए पानी का सबसे बड़ा स्रोत है।
विवाद पर ओडिशा की नई सरकार का क्या रुख है?
ओडिशा की नई भाजपा सरकार ने इस मुद्दे को बातचीत के माध्यम से सौहार्दपूर्ण और पारस्परिक रूप से लाभकारी तरीके से हल करने का इरादा व्यक्त किया है।
यह जानकारी केवल सामान्य जन-जागरूकता के उद्देश्य से प्रकाशित की गई है।


