स्मिथसोनियन के नेशनल म्यूजियम ऑफ एशियन आर्ट ने भारत को तीन बहुमूल्य मूर्तियाँ लौटाने की अपनी योजना की घोषणा की है। शुक्रवार को जारी एक बयान में, म्यूजियम ने कहा कि यह निर्णय गहन शोध के बाद लिया गया, जिसमें यह साबित हुआ कि इन मूर्तियों को अवैध रूप से मंदिर परिसरों से हटाया गया था।
लौटाई जाने वाली इन कांस्य मूर्तियों में ‘शिव नटराज’ (चोल काल, 10वीं शताब्दी), ‘सोमस्कंद’ (चोल काल, 12वीं शताब्दी), और ‘संत सुंदरार के साथ परवई’ (विजयनगर काल, 16वीं शताब्दी) शामिल हैं। ये सभी मूर्तियाँ कभी मंदिरों में होने वाले जुलूसों में उपयोग की जाने वाली पवित्र प्रतिमाओं का हिस्सा थीं।
म्यूजियम ने अपने दक्षिण एशियाई संग्रह की व्यवस्थित समीक्षा के हिस्से के रूप में इन तीन मूर्तियों के स्रोत की विस्तृत जांच की। इस जांच में प्रत्येक कलाकृति के लेनदेन के इतिहास की बारीकी से छानबीन की गई, जिससे उनके अवैध रूप से भारत से बाहर ले जाए जाने की पुष्टि हुई।
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने भी इन निष्कर्षों की समीक्षा की और पुष्टि की कि मूर्तियों को भारतीय कानूनों का उल्लंघन करके हटाया गया था।
लौटाई जाने वाली प्राचीन मूर्तियाँ
अमेरिका स्थित स्मिथसोनियन म्यूजियम तीन महत्वपूर्ण ऐतिहासिक मूर्तियों को भारत वापस भेजेगा। इनमें दो मूर्तियाँ चोल काल की और एक विजयनगर काल की है।
पहली मूर्ति 10वीं शताब्दी की ‘शिव नटराज’ की है, जो चोल काल की कांस्य कला का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। दूसरी मूर्ति 12वीं शताब्दी की ‘सोमस्कंद’ की है, जो भी चोल काल से संबंधित है। तीसरी मूर्ति ‘संत सुंदरार के साथ परवई’ की है, जो 16वीं शताब्दी के विजयनगर काल की है।
अवैध तस्करी की पुष्टि कैसे हुई?
म्यूजियम के शोधकर्ताओं ने 2023 में फ्रेंच इंस्टीट्यूट ऑफ पांडिचेरी के फोटो आर्काइव्स के सहयोग से यह पुष्टि की कि इन कांस्य मूर्तियों की तस्वीरें 1956 और 1959 के बीच तमिलनाडु, भारत के मंदिरों में खींची गई थीं। यह एक महत्वपूर्ण साक्ष्य था जिसने साबित किया कि मूर्तियाँ उस समय भारत में थीं।
‘शिव नटराज’ की मूर्ति तमिलनाडु के तंजावुर जिले की थिरुथुराईपूंडी तालुक में स्थित श्री भव औषधेश्वर मंदिर की थी, जहाँ 1957 में इसकी तस्वीर ली गई थी। म्यूजियम ने इसे 2002 में न्यूयॉर्क की डोरिस वीनर गैलरी से प्राप्त किया था। जांच में पता चला कि गैलरी ने बिक्री को सुविधाजनक बनाने के लिए म्यूजियम को जाली दस्तावेज दिए थे।
‘सोमस्कंद’ और ‘संत सुंदरार के साथ परवई’ की मूर्तियाँ 1987 में आर्थर एम. सैकलर द्वारा दिए गए 1,000 वस्तुओं के उपहार के हिस्से के रूप में म्यूजियम के संग्रह में शामिल हुईं। शोध से पुष्टि हुई कि ‘सोमस्कंद’ की तस्वीर 1959 में तमिलनाडु के मन्नारगुडी तालुक के अलत्तूर गांव के विश्वनाथ मंदिर में और ‘संत सुंदरार के साथ परवई’ की तस्वीर 1956 में कल्लाकुरिची तालुक के वीरसोलपुरम गांव के शिव मंदिर में ली गई थी।
मूर्तियों का ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व
चोल काल की कांस्य मूर्तियों को भारतीय कला के इतिहास में एक शिखर माना जाता है। विशेष रूप से ‘नटराज’ के रूप में शिव का चित्रण कला और दर्शन का एक अनूठा संगम है। इन मूर्तियों का न केवल कलात्मक महत्व है, बल्कि गहरा धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व भी है। भारत सरकार ने अपनी प्राचीन धरोहरों को संरक्षित करने के लिए पुरावशेष तथा बहुमूल्य कलाकृति अधिनियम, 1972 बनाया है, जो ऐसी वस्तुओं के अवैध निर्यात को प्रतिबंधित करता है। इन मूर्तियों को वापस लाना भारत की सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने के प्रयासों में एक महत्वपूर्ण कदम है।
म्यूजियम और सरकार के बीच समझौता
म्यूजियम के निदेशक, चेस एफ. रॉबिन्सन ने कहा, “नेशनल म्यूजियम ऑफ एशियन आर्ट सांस्कृतिक विरासत की जिम्मेदारी से देखभाल करने और हमारे संग्रह में पारदर्शिता को आगे बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध है।”
भारत के संस्कृति मंत्रालय ने मूर्तियों में से एक को लंबी अवधि के ऋण पर म्यूजियम में रखने पर सहमति व्यक्त की है। इससे म्यूजियम को वस्तु की उत्पत्ति, उसे हटाए जाने और वापसी की पूरी कहानी सार्वजनिक रूप से साझा करने का अवसर मिलेगा। ‘शिव नटराज’ की मूर्ति, जिसे लंबी अवधि के ऋण पर रखा जाना है, ‘दक्षिण एशिया, दक्षिण पूर्व एशिया और हिमालय में जानने की कला’ नामक प्रदर्शनी के हिस्से के रूप में प्रदर्शित की जाएगी।
यह कदम भारत और दुनिया भर के संस्थानों के बीच सांस्कृतिक विरासत को वापस लाने के लिए बढ़ते सहयोग को दर्शाता है। गहन शोध और नैतिक प्रथाओं के माध्यम से, अवैध रूप से हटाई गई कलाकृतियाँ धीरे-धीरे अपने मूल स्थान पर लौट रही हैं।
FAQs
स्मिथसोनियन म्यूजियम कौन सी मूर्तियाँ लौटा रहा है?
स्मिथसोनियन म्यूजियम तीन कांस्य मूर्तियाँ लौटा रहा है: ‘शिव नटराज’ (10वीं शताब्दी), ‘सोमस्कंद’ (12वीं शताब्दी), और ‘संत सुंदरार के साथ परवई’ (16वीं शताब्दी)।
यह कैसे साबित हुआ कि मूर्तियाँ अवैध रूप से हटाई गई थीं?
यह 1950 के दशक की तस्वीरों से साबित हुआ जो दिखाती थीं कि मूर्तियाँ तमिलनाडु के मंदिरों में थीं। फ्रेंच इंस्टीट्यूट ऑफ पांडिचेरी के फोटो आर्काइव्स और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने इन सबूतों की पुष्टि की।
ये मूर्तियाँ मूल रूप से कहाँ से थीं?
ये सभी मूर्तियाँ तमिलनाडु के अलग-अलग मंदिरों से थीं। ‘शिव नटराज’ तंजावुर जिले से, ‘सोमस्कंद’ मन्नारगुडी तालुक से, और ‘संत सुंदरार के साथ परवई’ कल्लाकुरिची तालुक के मंदिरों से संबंधित थीं।
मूर्तियाँ म्यूजियम तक कैसे पहुँचीं?
‘शिव नटराज’ की मूर्ति 2002 में न्यूयॉर्क की एक गैलरी से खरीदी गई थी, जिसने जाली दस्तावेजों का इस्तेमाल किया था। अन्य दो मूर्तियाँ 1987 में आर्थर एम. सैकलर द्वारा दिए गए एक बड़े उपहार का हिस्सा थीं।
क्या लौटाई गई मूर्ति वापस म्यूजियम में प्रदर्शित की जाएगी?
हाँ, भारतीय संस्कृति मंत्रालय की सहमति से ‘शिव नटराज’ की मूर्ति को लंबी अवधि के ऋण पर म्यूजियम में रखा जाएगा ताकि इसकी पूरी कहानी एक प्रदर्शनी के हिस्से के रूप में दिखाई जा सके।
यह जानकारी केवल सामान्य जन-जागरूकता के उद्देश्य से प्रकाशित की गई है।


