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रक्षा नवाचार पर राजनाथ सिंह ने डीआरडीओ को दिया सर्वाइवल ऑफ द फास्टेस्ट का मंत्र

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (DRDO) से नए हथियारों और प्रणालियों के विकास चक्र में तेजी लाने का आग्रह किया है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि अनुसंधान से लेकर तैनाती तक के विभिन्न चरणों में होने वाली देरी को कम करना अत्यंत आवश्यक है।

मंगलवार को DRDO के शीर्ष वैज्ञानिकों को संबोधित करते हुए, रक्षा मंत्री ने कहा कि किसी भी प्रणाली की प्रभावशीलता का अंतिम पैमाना सशस्त्र बलों में उसका समय पर शामिल होना है। उन्होंने कहा कि प्रौद्योगिकी बहुत तेजी से बदल रही है, और कोई भी नवाचार चार से पांच वर्षों के भीतर पुराना हो सकता है। आधुनिक युद्धक्षेत्रों में ‘सबसे योग्य’ के बजाय ‘सबसे तेज’ ही जीवित रहता है।

सिंह ने कहा कि जो राष्ट्र तेजी से अत्याधुनिक तकनीक की अवधारणा, निर्णय और तैनाती करते हैं, वे एक निर्णायक बढ़त बनाए रखते हैं। उन्होंने DRDO को निजी क्षेत्र के साथ मिलकर सह-विकास मॉडल अपनाने की सलाह दी, ताकि डिजाइन से लेकर उत्पादन तक की प्रक्रिया को सुव्यवस्थित किया जा सके और बेहतर परिणाम मिल सकें।

यह कदम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘आत्मनिर्भर भारत’ अभियान के अनुरूप है, जिसका उद्देश्य रक्षा क्षेत्र में आयात पर निर्भरता को कम करना और स्वदेशी क्षमताओं को बढ़ावा देना है।

विकास चक्र में तेजी लाने का आग्रह

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने अनुसंधान से प्रोटोटाइप, प्रोटोटाइप से परीक्षण और परीक्षण से अंतिम तैनाती तक के प्रमुख चरणों में होने वाली देरी को कम करने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि तेजी से बदलती प्रौद्योगिकी के इस युग में गति का महत्व सर्वोपरि है। जो देश नई तकनीक को तेजी से अपनाते हैं, वे सामरिक रूप से आगे रहते हैं।

सह-विकास मॉडल और निजी क्षेत्र की भूमिका

परंपरागत रूप से, DRDO डिजाइन और प्रोटोटाइप पर ध्यान केंद्रित करता रहा है, जबकि उत्पादन का कार्य उद्योग भागीदारों पर छोड़ दिया जाता है। सिंह ने इस अंतर को पाटने के लिए वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाओं को अपनाने का आह्वान किया। उन्होंने सुझाव दिया कि निजी फर्मों को शुरुआत से ही डिजाइन, परीक्षण और निर्माण प्रक्रिया में शामिल किया जाना चाहिए। उन्होंने DRDO को उच्च जोखिम वाली ‘मूनशॉट’ परियोजनाओं के लिए एक समर्पित आंतरिक विंग बनाने की भी सलाह दी, जो सफल होने पर ऐतिहासिक सफलताएं दिला सकती हैं।

रक्षा निर्यात और आत्मनिर्भरता का लक्ष्य

भारत का लक्ष्य 2029-30 तक 50,000 करोड़ रुपये का रक्षा निर्यात हासिल करना है। इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए, राजनाथ सिंह ने DRDO को ड्रोन, रडार, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणाली और गोला-बारूद जैसे उत्पादों को शुरुआत से ही निर्यात-उन्मुख डिजाइन के साथ विकसित करने का निर्देश दिया। उन्होंने कहा कि यह रणनीति लागत वसूली में मदद करती है, वैश्विक विश्वसनीयता बढ़ाती है और रणनीतिक गठजोड़ को बढ़ावा देती है। हल्का लड़ाकू विमान (LCA) तेजस, DRDO और हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) के बीच सफल सहयोग का एक उत्कृष्ट उदाहरण है।

स्वदेशी प्रणालियों का महत्व

रक्षा मंत्री ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ का उल्लेख करते हुए कहा कि इसने युद्ध के मैदान में स्वदेशी प्रणालियों की शक्ति को उजागर किया है, जिसमें DRDO की प्रौद्योगिकियां निर्णायक साबित हुईं। उन्होंने संगठन के परिचालन तत्परता और आत्मनिर्भरता में योगदान की सराहना की। DRDO का अग्नि और ब्रह्मोस जैसी मिसाइलों के विकास का एक सफल ट्रैक रिकॉर्ड रहा है, लेकिन तेजस एमके2 जैसी परियोजनाओं में देरी पर चिंता भी व्यक्त की गई है। राजनाथ सिंह का यह निर्देश ऐसी बाधाओं को दूर करने का एक प्रयास है।

यह पहल भारत को रक्षा प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में एक प्रमुख निर्यातक के रूप में स्थापित करने और सशस्त्र बलों को भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार करने में मदद करेगी। संगठन को अब एक विकासकर्ता से एक पारिस्थितिकी तंत्र के संचालक के रूप में विकसित होने की आवश्यकता है।

FAQs

रक्षा मंत्री ने DRDO को क्या निर्देश दिए हैं?

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने DRDO को नए हथियारों और प्रणालियों के विकास चक्र में तेजी लाने, देरी को कम करने और निजी क्षेत्र के साथ सह-विकास मॉडल अपनाने का निर्देश दिया है।

विकास प्रक्रिया में निजी क्षेत्र की क्या भूमिका होगी?

निजी क्षेत्र की कंपनियों को डिजाइन, परीक्षण और निर्माण सहित विकास प्रक्रिया के शुरुआती चरणों से ही शामिल किया जाएगा ताकि प्रक्रिया को सुव्यवस्थित किया जा सके और उत्पादन में तेजी लाई जा सके।

भारत का रक्षा निर्यात का लक्ष्य क्या है?

भारत सरकार ने वर्ष 2029-30 तक 50,000 करोड़ रुपये मूल्य के रक्षा उपकरणों और प्रणालियों के निर्यात का लक्ष्य रखा है।

‘ऑपरेशन सिंदूर’ का क्या महत्व है?

‘ऑपरेशन सिंदूर’ एक हालिया आतंकवाद-रोधी अभियान था जिसमें DRDO द्वारा विकसित स्वदेशी गोला-बारूद और निगरानी तकनीक की प्रभावशीलता वास्तविक युद्ध परिदृश्यों में साबित हुई।

DRDO को ‘मूनशॉट’ परियोजनाओं पर ध्यान केंद्रित करने की सलाह क्यों दी गई?

DRDO को उच्च-जोखिम वाली ‘मूनशॉट’ परियोजनाओं पर काम करने की सलाह दी गई है क्योंकि ये परियोजनाएं अनिश्चित होती हैं लेकिन सफल होने पर देश को रक्षा प्रौद्योगिकी में ऐतिहासिक बढ़त दिला सकती हैं।

यह जानकारी केवल सामान्य जन-जागरूकता के उद्देश्य से प्रकाशित की गई है।

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