राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में अमेरिकी विदेश नीति और दुनियाभर में इसके कार्यान्वयन में एक तेज बदलाव देखा जा रहा है। सोवियत संघ के पतन के बाद से, संयुक्त राज्य अमेरिका ने एक प्रमुख शक्ति के रूप में काम किया, जिसने एकध्रुवीय दुनिया का निर्माण किया और दुनिया भर में भू-राजनीतिक बदलावों के प्रबंधक की भूमिका निभाई। इस दौरान अंतर्राष्ट्रीय गठबंधन, विश्व संस्थान और नियम मौजूद थे, जिन्होंने वैश्वीकृत दुनिया, सुरक्षा और कूटनीति को कार्यशील बनाए रखा।
राष्ट्रपति ट्रंप की नीतियों ने इस धारणा को समाप्त कर दिया है कि वाशिंगटन वैश्विक प्रबंधक की भूमिका निभाता रहेगा। इसके परिणामस्वरूप विश्व राजनीतिक व्यवस्था में एक विखंडन और खालीपन की स्थिति उत्पन्न हुई है, जहाँ कोई भी नेतृत्व करने को तैयार नहीं है, लेकिन हर कोई परिस्थितियों के अनुसार ढलने की कोशिश कर रहा है।
शीत युद्ध के बाद पहली बार, वाशिंगटन एक वैश्विक प्रबंधक के बजाय एक स्व-हितैषी वैश्विक शक्ति के रूप में कार्य कर रहा है। ट्रंप प्रशासन के तहत, संयुक्त राज्य अमेरिका अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता दे रहा है, चाहे वह सहयोगियों के साथ व्यापार समझौते हों या अंतर्राष्ट्रीय संधियों से हटना हो। यह बदलाव वैश्विक शक्ति संतुलन को प्रभावित कर रहा है, जिससे अन्य देशों को अपनी विदेश नीतियों पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है।
अमेरिकी विदेश नीति में बदलाव
डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में, संयुक्त राज्य अमेरिका की विदेश नीति स्पष्ट रूप से अपने हितों पर केंद्रित हो गई है। इसके कई उदाहरण देखे गए हैं, जैसे यूरोपीय भागीदारों से NATO फंडिंग पर सवाल करना, यूक्रेन को एक शांति योजना स्वीकार करने के लिए प्रेरित करना, ईरान का सामना करना, और गाजा में सावधानी से संलग्न होना।
इसके अलावा, अमेरिका ने अपने रणनीतिक भागीदारों को कराधान की धमकी देकर अपनी मांगें मनवाने, वेनेजुएला के निकोलस मादुरो की गिरफ्तारी के बाद तेल सौदों पर एक समझ बनाने, और ग्रीनलैंड के प्रति क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाएं दिखाने जैसे कदम उठाए हैं। ये सभी कार्रवाइयां दर्शाती हैं कि अमेरिका अब अपने राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रख रहा है।
अंतर्राष्ट्रीय संस्थानों पर प्रभाव
इस नई दिशा से बहुपक्षीय संस्थान भारी रूप से प्रभावित हुए हैं। संयुक्त राष्ट्र, विश्व व्यापार संगठन (WTO) और अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थान एक अमेरिकी नेतृत्व वाली दुनिया के लिए बनाए गए थे। मजबूत अमेरिकी समर्थन के बिना, ये संस्थान नियमों को लागू करने या संसाधन जुटाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
अमेरिका द्वारा हाल ही में 66 प्रमुख अंतर्राष्ट्रीय संगठनों से अपनी सदस्यता वापस लेना इस बात का प्रमाण है कि वह अब दुनिया की समस्याओं को सुलझाने में रुचि नहीं रखता है। इससे यह सवाल उठता है कि इस खालीपन को कौन भरेगा। वैश्विक संस्थानों में चीनी उपस्थिति पहले से ही बढ़ रही है, जो सहयोग के बजाय प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देती है।
सहयोगियों और नई वैश्विक व्यवस्था
1991 के बाद, विश्व व्यवस्था इस विचार के इर्द-गिर्द बनाई गई थी कि संयुक्त राज्य अमेरिका वैश्विक स्थिरता का केंद्र होगा। NATO ने सुरक्षा प्रदान की, WTO ने व्यापार को नियंत्रित किया, और संयुक्त राष्ट्र ने संकटों का प्रबंधन किया। ट्रंप ने इस संरचना को तोड़ा नहीं, बल्कि इसकी नाजुकता को उजागर किया। उन्होंने गठबंधनों को व्यावसायिक लेनदेन के रूप में देखा और बहुपक्षीय प्रतिबद्धताओं से पीछे हट गए।
इसके परिणामस्वरूप, दुनिया क्षेत्रीय शक्ति समूहों की ओर बढ़ रही है। चीन दक्षिण-पूर्व एशिया के कुछ हिस्सों पर हावी है, रूस यूरेशियन क्षेत्र को आकार दे रहा है, पश्चिम एशिया में इज़राइल, तुर्की, ईरान और सऊदी अरब प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं, और भारत हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अपना प्रभाव बढ़ाना चाहता है। कोई एक शक्ति अब नियम तय नहीं कर रही है।
बहु-संरेखण का नया युग
कई देश अब किसी एक पक्ष को चुनने के बजाय बहु-संरेखण की रणनीति अपना रहे हैं। वे अपने राष्ट्रीय हित के आधार पर विकल्प चुन रहे हैं। उदाहरण के लिए, भारत से लेकर खाड़ी देशों और वियतनाम तक, कई देश चीन के साथ व्यापार करते हैं, संयुक्त राज्य अमेरिका से हथियार खरीदते हैं, रूस के साथ सहयोग करते हैं और यूरोपीय बाजारों में अपना सामान बेचते हैं। इस रणनीति के माध्यम से, वे स्थायी प्रतिबद्धताओं से बचते हैं। यह नई रणनीति किसी विचारधारा पर नहीं, बल्कि बिना स्थिर नेतृत्व वाली दुनिया में अस्तित्व बनाए रखने पर आधारित है।
“मेक अमेरिका ग्रेट अगेन” नारे के तहत राष्ट्रपति ट्रंप की वापसी यह दर्शाती है कि वह दुनिया के लिए नहीं, बल्कि संयुक्त राज्य अमेरिका के लिए शासन कर रहे हैं। यह स्वीकार करने का समय है कि शीत युद्ध के बाद की व्यवस्था समाप्त हो रही है। आगे एक प्रतिस्पर्धी, बहुध्रुवीय युग है, जहाँ चीन, भारत, दक्षिण अफ्रीका और ब्राजील जैसे देश अपने प्रभाव क्षेत्र का निर्माण करेंगे।
FAQs
अमेरिकी विदेश नीति में मुख्य बदलाव क्या है?
अमेरिकी विदेश नीति में मुख्य बदलाव वैश्विक प्रबंधक की भूमिका से हटकर “अमेरिका फर्स्ट” यानी अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देने की ओर है। अमेरिका अब गठबंधनों को रणनीतिक साझेदारी के बजाय व्यावसायिक लेनदेन के रूप में देख रहा है।
इस नीति ने अंतर्राष्ट्रीय संगठनों को कैसे प्रभावित किया है?
मजबूत अमेरिकी समर्थन की कमी के कारण संयुक्त राष्ट्र और विश्व व्यापार संगठन जैसे अंतर्राष्ट्रीय संगठन नियमों को लागू करने और संसाधन जुटाने में संघर्ष कर रहे हैं। अमेरिका ने 66 प्रमुख संगठनों से अपनी सदस्यता भी वापस ले ली है।
‘बहु-संरेखण’ की रणनीति क्या है?
बहु-संरेखण एक ऐसी रणनीति है जिसमें देश किसी एक शक्तिशाली गुट के साथ स्थायी रूप से जुड़ने के बजाय अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर कई देशों के साथ संबंध बनाते हैं। वे एक ही समय में अमेरिका, चीन और रूस जैसे प्रतिस्पर्धी देशों के साथ सहयोग करते हैं।
कौन से देश क्षेत्रीय शक्तियों के रूप में उभर रहे हैं?
रिपोर्ट के अनुसार, चीन, रूस, भारत, तुर्की, ईरान, सऊदी अरब, दक्षिण अफ्रीका और ब्राजील जैसे देश अपने-अपने क्षेत्रों में प्रमुख शक्तियों के रूप में उभर रहे हैं और अपने प्रभाव क्षेत्र का विस्तार कर रहे हैं।
अमेरिका ने कितने प्रमुख अंतर्राष्ट्रीय संगठनों से अपनी सदस्यता वापस ली है?
रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है कि संयुक्त राज्य अमेरिका ने 66 प्रमुख अंतर्राष्ट्रीय संगठनों से अपनी सदस्यता वापस ले ली है, जो वैश्विक मामलों से उसके पीछे हटने का संकेत है।
यह जानकारी केवल सामान्य जन-जागरूकता के उद्देश्य से प्रकाशित की गई है।


