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जातिगत भेदभाव पर UGC के नियम, क्यों केंद्र और BJP की बढ़ी मुश्किलें?

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा उच्च शिक्षा संस्थानों के लिए हाल ही में अधिसूचित “समता विनियमों” पर हो रहे विरोध के बीच, केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने मंगलवार को कहा कि किसी को भी इन प्रावधानों का दुरुपयोग करने की अनुमति नहीं दी जाएगी और “किसी के भी खिलाफ भेदभाव की अनुमति नहीं होगी”।

प्रधान ने मीडियाकर्मियों से कहा, “…किसी के खिलाफ उत्पीड़न की अनुमति नहीं दी जाएगी… भेदभाव नहीं होगा… किसी को भी (विनियमों का) दुरुपयोग करने का अधिकार नहीं होगा… यूजीसी, केंद्र सरकार या राज्य सरकारें… सबकी जिम्मेदारी होगी।” उन्होंने यह भी कहा कि ये विनियम, जिन्हें 13 जनवरी को अधिसूचित किया गया था, “संविधान के दायरे में” हैं और “सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में किए गए हैं”।

UGC के इन नए नियमों ने 2012 के समता विनियमों की जगह ली है। इनके लागू होने के बाद से ही विभिन्न समूह, खासकर सोशल मीडिया पर, विरोध कर रहे हैं। प्रदर्शनकारियों का दावा है कि इनका इस्तेमाल सामान्य वर्ग के छात्रों को “परेशान करने” और “जातिगत विभाजन” पैदा करने के लिए किया जा सकता है। इसी क्रम में मंगलवार को कुछ छात्रों ने दिल्ली स्थित यूजीसी कार्यालय के बाहर भी इन नियमों को वापस लेने की मांग को लेकर प्रदर्शन किया।

यह मामला तब और गंभीर हो गया जब सोमवार को बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री ने इन विनियमों सहित अन्य कारणों का हवाला देते हुए अपने पद से इस्तीफे की घोषणा कर दी। इसके अलावा उत्तर प्रदेश में भाजपा के 11 पदाधिकारियों के भी विरोध में पद छोड़ने की खबरें सामने आईं।

केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का आश्वासन

विरोध प्रदर्शनों के तेज होने के बाद, केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने स्पष्ट किया कि सरकार इन नियमों के दुरुपयोग को रोकने के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने आश्वासन दिया कि किसी भी व्यक्ति के साथ किसी भी प्रकार का भेदभाव या उत्पीड़न बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि केंद्र सरकार, राज्य सरकारें और यूजीसी स्वयं यह सुनिश्चित करने के लिए जिम्मेदार होंगे कि नियमों का सही तरीके से पालन हो। प्रधान ने यह भी रेखांकित किया कि ये नियम संवैधानिक ढांचे के भीतर और सुप्रीम कोर्ट के पर्यवेक्षण में तैयार किए गए हैं।

क्या हैं नए UGC इक्विटी रेगुलेशन?

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता का संवर्धन) विनियम, 2024 को 13 जनवरी को अधिसूचित किया गया था। यह 2012 के पुराने नियमों की जगह लेता है। इन नए नियमों में कुछ महत्वपूर्ण बदलाव किए गए हैं। इसमें जातिगत भेदभाव को परिभाषित करते हुए विशेष रूप से अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) का उल्लेख किया गया है। नियमों के अनुसार, “जाति-आधारित भेदभाव का अर्थ अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य पिछड़ा वर्गों के सदस्यों के खिलाफ केवल जाति या जनजाति के आधार पर भेदभाव है।” इसके अलावा, उच्च शिक्षण संस्थानों में स्थापित की जाने वाली ‘समता समितियों’ में ओबीसी प्रतिनिधियों को शामिल करना अनिवार्य किया गया है।

विरोध और आपत्तियों के मुख्य कारण

इन नियमों पर उठाई जा रही मुख्य आपत्ति यह है कि इसमें “भेदभाव की झूठी शिकायतों” के खिलाफ दंड का कोई प्रावधान नहीं है। आलोचकों का तर्क है कि इससे सामान्य वर्ग के छात्रों को निशाना बनाया जा सकता है। इसके विपरीत, यदि संस्थान इन नियमों का पालन नहीं करते हैं तो उन पर कार्रवाई की जा सकती है। दिलचस्प बात यह है कि पिछले साल फरवरी में फीडबैक के लिए साझा किए गए नियमों के मसौदे में झूठी शिकायतों के मामले में दंड का प्रावधान शामिल था, जिसे अंतिम अधिसूचना से हटा दिया गया है। इसी वजह से बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट और यूपी में कुछ भाजपा पदाधिकारियों ने भी इस्तीफा दे दिया है।

मामले की सुप्रीम कोर्ट पृष्ठभूमि

शिक्षा मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार, इन विनियमों की जड़ें सुप्रीम कोर्ट में दायर एक याचिका से जुड़ी हैं। यह याचिका कथित जाति-आधारित भेदभाव के कारण आत्महत्या करने वाले रोहित वेमुला और पायल तडवी की माताओं द्वारा दायर की गई थी, और यह मामला अभी भी अदालत में लंबित है। 15 जनवरी को हुई पिछली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने 13 जनवरी को यूजीसी द्वारा नए नियमों की अधिसूचना पर ध्यान दिया था। मामले की अगली सुनवाई 19 मार्च को होनी है। इसके अतिरिक्त, अधिवक्ता विनीत जिंदल ने भी सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर कर पूछा है कि जाति-आधारित भेदभाव की परिभाषा में “सामान्य या उच्च जातियों” के व्यक्तियों को इसके सुरक्षात्मक दायरे से बाहर क्यों रखा गया है।

विभिन्न छात्र संगठनों की प्रतिक्रियाएं

आरएसएस के छात्र संगठन एबीवीपी ने एक संतुलित बयान में कहा कि चूंकि मामला सुप्रीम कोर्ट में है, इसलिए यूजीसी को “अदालत के समक्ष जल्द से जल्द अपनी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए और एक हलफनामा दायर करना चाहिए।” वहीं, कांग्रेस के छात्र संगठन एनएसयूआई ने इन नियमों का स्वागत किया, लेकिन इसे केवल “प्रतीकवाद” करार दिया। एनएसयूआई अध्यक्ष वरुण चौधरी ने मांग की कि प्रस्तावित समिति में एससी, एसटी और ओबीसी समुदायों के छात्रों और शिक्षकों का अनिवार्य प्रतिनिधित्व होना चाहिए। ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) ने नियमों का बचाव करते हुए कहा कि छात्र आंदोलन वर्षों से “रोहित एक्ट” की मांग कर रहा है।

विरोध प्रदर्शनों के बीच सरकार ने स्पष्ट किया है कि यूजीसी के नए समता विनियमों का दुरुपयोग नहीं होने दिया जाएगा। हालांकि, झूठी शिकायतों पर दंड के प्रावधान की कमी और नियमों की व्याख्या को लेकर चिंताएं बनी हुई हैं, और यह मामला अब सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में है, जहां विभिन्न याचिकाओं पर सुनवाई होनी है।

FAQs

नए UGC इक्विटी रेगुलेशन क्या हैं?

यह उच्च शिक्षा संस्थानों में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के छात्रों के खिलाफ जाति-आधारित भेदभाव को रोकने और समानता को बढ़ावा देने के लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा जारी किए गए नए नियम हैं।

इन नियमों का विरोध क्यों हो रहा है?

विरोध का मुख्य कारण यह है कि इन नियमों में भेदभाव की झूठी शिकायत करने वालों के खिलाफ दंड का कोई प्रावधान नहीं है, जिससे इसके दुरुपयोग की आशंका जताई जा रही है।

शिक्षा मंत्री ने इस पर क्या कहा है?

केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने आश्वासन दिया है कि इन नियमों का किसी भी कीमत पर दुरुपयोग नहीं होने दिया जाएगा और किसी के भी खिलाफ भेदभाव या उत्पीड़न को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की क्या भूमिका है?

ये नियम सुप्रीम कोर्ट में लंबित एक याचिका के बाद लाए गए हैं, जो रोहित वेमुला और पायल तडवी की आत्महत्या से संबंधित है। सुप्रीम कोर्ट इस मामले की निगरानी कर रहा है और इस पर एक और याचिका भी दायर की गई है।

2012 के नियमों से यह कैसे अलग हैं?

नए नियमों में जातिगत भेदभाव की परिभाषा में विशेष रूप से ओबीसी को शामिल किया गया है और संस्थानों में बनने वाली समता समितियों में ओबीसी प्रतिनिधियों की अनिवार्य उपस्थिति का प्रावधान किया गया है।

यह जानकारी केवल सामान्य जन-जागरूकता के उद्देश्य से प्रकाशित की गई है।

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