अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के बीच मध्य पूर्वी देशों ने दोनों पक्षों से संयम बरतने का आग्रह किया है। यह अपील ऐसे समय में आई है जब ट्रम्प प्रशासन ईरान पर संभावित हमले की चेतावनी दे रहा है और क्षेत्र में अपनी सैन्य उपस्थिति लगातार बढ़ा रहा है। इस मामले से परिचित एक अरब राजनयिक के अनुसार, इस क्षेत्र के देश किसी भी तरह के सैन्य टकराव को टालना चाहते हैं, क्योंकि इसका असर पूरे मध्य पूर्व पर पड़ सकता है।
सऊदी अरब, तुर्की, ओमान और कतर जैसे प्रमुख अमेरिकी सहयोगियों ने वाशिंगटन और तेहरान में नेताओं से संपर्क किया है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि किसी भी पक्ष द्वारा उठाया गया कोई भी आक्रामक कदम पूरे क्षेत्र में भारी अस्थिरता पैदा करेगा। इससे न केवल राजनयिक संकट गहराएगा, बल्कि वैश्विक ऊर्जा बाजारों पर भी इसका गंभीर प्रभाव पड़ेगा, क्योंकि यह क्षेत्र दुनिया के प्रमुख तेल उत्पादकों में से एक है।
अरब और मुस्लिम देशों को डर है कि अगर अमेरिका ईरान पर किसी भी तरह का हमला करता है, तो तेहरान की जवाबी कार्रवाई सीधे तौर पर उनके देशों या उनके यहां मौजूद अमेरिकी हितों को निशाना बना सकती है। इससे भारी जान-माल का नुकसान हो सकता है और संघर्ष उनके अपने क्षेत्र में फैल सकता है। इसी संदेश को लेकर सऊदी अरब के रक्षा मंत्री वाशिंगटन में उच्च स्तरीय वार्ता कर रहे हैं।
यह स्थिति 2018 में अमेरिका द्वारा ईरान परमाणु समझौते (जेसीपीओए) से एकतरफा हटने के बाद से ही तनावपूर्ण बनी हुई है। समझौते से हटने के बाद, अमेरिका ने ईरान पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए थे, जिससे ईरान की अर्थव्यवस्था बुरी तरह प्रभावित हुई और देश में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए। इन्हीं प्रदर्शनों पर हुई कार्रवाई को अमेरिका ने शुरू में सैन्य हस्तक्षेप का एक कारण बताया था।
मध्य पूर्वी देशों की संयम बरतने की अपील
एक अरब अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि सऊदी अरब, तुर्की, ओमान और कतर ने अमेरिका और ईरान, दोनों से तनाव कम करने के लिए कहा है। इन देशों का मानना है कि सैन्य टकराव से पूरे क्षेत्र में अस्थिरता फैल जाएगी और ऊर्जा बाजार बुरी तरह प्रभावित होंगे। वे किसी भी हालत में अपने क्षेत्र को युद्ध का अखाड़ा नहीं बनने देना चाहते।
सऊदी अरब के रक्षा मंत्री खालिद बिन सलमान इस मुद्दे पर बातचीत के लिए वाशिंगटन में हैं। उन्होंने शुक्रवार को सोशल मीडिया पर बताया कि उन्होंने अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो, रक्षा सचिव पीट हेगसेथ और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों के साथ “क्षेत्रीय और वैश्विक शांति तथा स्थिरता को आगे बढ़ाने के प्रयासों” पर चर्चा की।
ट्रम्प प्रशासन का बदलता रुख और चेतावनी
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने हाल के दिनों में ईरान के खिलाफ संभावित सैन्य कार्रवाई के अपने तर्क को बदला है। पहले वह राष्ट्रव्यापी विरोध प्रदर्शनों पर कार्रवाई को आधार बता रहे थे, लेकिन अब उनका ध्यान ईरान के परमाणु कार्यक्रम को रोकने पर केंद्रित हो गया है। हालांकि, वह यह भी जोर दे रहे हैं कि जून में हुए अमेरिकी हमलों में ईरानी परमाणु स्थलों को “नष्ट” कर दिया गया था।
शुक्रवार को ट्रम्प ने कहा कि वह ईरान के साथ एक समझौता करने की उम्मीद करते हैं, लेकिन साथ ही चेतावनी दी, “अगर हम कोई समझौता नहीं करते हैं, तो हम देखेंगे कि क्या होता है।” उन्होंने इस बात की पुष्टि की कि उन्होंने अपनी धमकियाँ सीधे ईरानी अधिकारियों तक पहुँचाई हैं, लेकिन इसका कोई विवरण नहीं दिया। ट्रम्प ने एक सोशल मीडिया पोस्ट में लिखा, “उम्मीद है कि ईरान जल्द ही ‘टेबल पर आएगा’ और एक निष्पक्ष समझौते पर बातचीत करेगा – कोई परमाणु हथियार नहीं।”
ईरान की प्रतिक्रिया और तुर्की की मध्यस्थता की पेशकश
ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने शुक्रवार को इस्तांबुल में तुर्की के अधिकारियों से मुलाकात के दौरान कहा कि उनका देश तनाव को हल करने के लिए बातचीत के लिए तैयार है, लेकिन अमेरिकी समकक्षों के साथ बातचीत की कोई ठोस योजना नहीं है। उन्होंने यह भी कहा, “इस्लामिक गणराज्य ईरान, जैसे बातचीत के लिए तैयार है, वैसे ही वह युद्ध के लिए भी तैयार है।”
इस बीच, तुर्की तनाव कम करने की कोशिश कर रहा है। तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन ने शुक्रवार को ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन के साथ एक टेलीफोन कॉल के दौरान ईरान और अमेरिका के बीच “सुविधाकर्ता” के रूप में कार्य करने की पेशकश की।
क्षेत्र में बढ़ती अमेरिकी सैन्य तैनाती
तनाव के बीच, अमेरिकी सेना ने इस क्षेत्र में अपनी उपस्थिति मजबूत की है। अमेरिका ने विमानवाहक पोत यूएसएस अब्राहम लिंकन और तीन गाइडेड-मिसाइल विध्वंसक को क्षेत्र में भेजा है। इसके साथ ही हजारों अतिरिक्त सैनिक भी मध्य पूर्व में तैनात किए गए हैं, जहाँ पहले से ही अमेरिकी विध्वंसक और अन्य जहाज मौजूद हैं।
अरब अधिकारी के अनुसार, क्षेत्र के देश अमेरिका को यह संदेश दे रहे हैं कि उसे अत्यधिक सावधानी से आगे बढ़ना चाहिए। वहीं, ईरान को यह संदेश दिया जा रहा है कि यदि अमेरिका हमला करता है, तो उसे अपनी प्रतिक्रिया को सावधानीपूर्वक नियंत्रित करना चाहिए और ऐसा कोई कदम नहीं उठाना चाहिए जिससे उसके पड़ोसियों पर असर पड़े। पिछले साल जब ट्रम्प ने ईरान के परमाणु ठिकानों पर हवाई हमलों का आदेश दिया था, तब कतर में अमेरिकी संपत्ति ईरानी जवाबी कार्रवाई का निशाना बनी थी।
यह पूरा घटनाक्रम अमेरिका और ईरान के बीच दशकों से चले आ रहे अविश्वास और शत्रुता का परिणाम है। 2015 के परमाणु समझौते का उद्देश्य इस तनाव को कम करना था, लेकिन अमेरिका के इससे हटने के बाद स्थिति और भी खराब हो गई। अब मध्य पूर्वी देश इस आग को फैलने से रोकने के लिए कूटनीतिक प्रयास कर रहे हैं।
FAQs
कौन से देश अमेरिका और ईरान से संयम बरतने का आग्रह कर रहे हैं?
सऊदी अरब, तुर्की, ओमान और कतर जैसे मध्य पूर्वी देश अमेरिका और ईरान से संयम बरतने का आग्रह कर रहे हैं ताकि क्षेत्र में किसी भी तरह के सैन्य टकराव को टाला जा सके।
अमेरिका ने इस क्षेत्र में अपनी सैन्य उपस्थिति कैसे बढ़ाई है?
अमेरिका ने विमानवाहक पोत यूएसएस अब्राहम लिंकन और तीन गाइडेड-मिसाइल विध्वंसक सहित हजारों अतिरिक्त सैनिकों को मध्य पूर्व में तैनात करके अपनी सैन्य उपस्थिति बढ़ाई है।
ईरान का मौजूदा तनाव पर क्या कहना है?
ईरान के विदेश मंत्री ने कहा है कि उनका देश बातचीत के लिए तैयार है, लेकिन साथ ही वह “युद्ध के लिए भी तैयार है”।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ईरान को क्या संदेश दिया है?
राष्ट्रपति ट्रम्प ने कहा है कि वह ईरान के साथ एक नया समझौता करना चाहते हैं जिसमें परमाणु हथियारों पर रोक हो, लेकिन उन्होंने चेतावनी भी दी है कि अगर समझौता नहीं हुआ तो परिणाम भुगतने होंगे।
मध्य पूर्वी देशों को किस बात का डर है?
मध्य पूर्वी देशों को डर है कि अमेरिका और ईरान के बीच सैन्य टकराव से पूरे क्षेत्र में भारी अस्थिरता फैल जाएगी, उनके देशों को निशाना बनाया जा सकता है और वैश्विक ऊर्जा बाजारों पर गंभीर असर पड़ेगा।
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