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आर्कटिक में बढ़ते समुद्री शोर की क़ीमत चुका रहे हैं वन्यजीव

आर्कटिक महासागर में बढ़ता शोर अब एक गंभीर चिंता का विषय बन गया है, जिसका मुख्य कारण जलवायु परिवर्तन और बढ़ती मानवीय गतिविधियाँ हैं। जर्नल npj Acoustics में प्रकाशित एक हालिया अध्ययन के अनुसार, पिघलती समुद्री बर्फ, नए शिपिंग मार्गों का खुलना और अपतटीय औद्योगिक संचालन मिलकर इस क्षेत्र के शांत समुद्री वातावरण को बदल रहे हैं। यह बदलाव उन वन्यजीवों के लिए सीधा खतरा पैदा कर रहा है जो जीवित रहने के लिए ध्वनि पर निर्भर करते हैं।

शोधकर्ताओं की रिपोर्ट है कि यह क्षेत्र, जो कभी दुनिया के सबसे शांत समुद्री वातावरणों में से एक माना जाता था, अब लगातार कोलाहलपूर्ण होता जा रहा है। आर्कटिक के ठंडे पानी में ध्वनि तरंगें गर्म महासागरों की तुलना में कहीं अधिक दूरी तक यात्रा करती हैं, जिससे जहाजों के इंजन, सोनार और निर्माण गतिविधियों का प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है।

यह ध्वनि प्रदूषण समुद्री स्तनधारियों जैसे बोहेड व्हेल, बेलुगा और नरव्हेल के लिए विशेष रूप से हानिकारक है। ये जीव नेविगेशन, शिकार और एक-दूसरे से संवाद करने के लिए ध्वनि का उपयोग करते हैं। बढ़ा हुआ शोर उनके संचार संकेतों को बाधित कर सकता है, उनमें तनाव बढ़ा सकता है और उनके प्रवासन मार्गों को बदलने के लिए मजबूर कर सकता है।

जलवायु परिवर्तन और उद्योग से बदलता आर्कटिक का ध्वनि परिदृश्य

एक समय था जब आर्कटिक में लंबे समय तक ध्वनिक शांति रहती थी, जिसे केवल बर्फ खिसकने या मौसमी तूफानों जैसी प्राकृतिक आवाजें ही भंग करती थीं। लेकिन अब यह संतुलन तेजी से बदल रहा है। जलवायु परिवर्तन के कारण घटते बर्फ के आवरण से नए शिपिंग गलियारे खुल रहे हैं, जिससे पर्यटन, अनुसंधान जहाजों और संसाधन अन्वेषण के लिए पहुंच बढ़ गई है।

अध्ययन के प्रमुख लेखक डॉ. फिलिप ब्लोंडेल के अनुसार, “इन परिवर्तनों से पानी के नीचे की ध्वनियों की तीव्रता और विविधता बढ़ रही है, जो ठंडे उत्तरी जल में सैकड़ों किलोमीटर तक यात्रा कर सकती हैं।” ध्रुवीय समुद्रों में कम तापमान और स्थिर जल परतें ध्वनि तरंगों को बहुत दूर तक फैलने में मदद करती हैं, जिससे हर मानवीय गतिविधि का ध्वनिक प्रभाव बढ़ जाता है।

समुद्री जीवों और पारिस्थितिकी तंत्र पर प्रभाव

अध्ययन में बताया गया है कि बोहेड व्हेल, बेलुगा और नरव्हेल जैसे समुद्री स्तनधारी अपने अस्तित्व के लिए ध्वनि पर बहुत अधिक निर्भर हैं। लंबे समय तक बढ़े हुए शोर के संपर्क में रहने से उनके संचार में बाधा आती है, तनाव बढ़ता है और उनके पारंपरिक प्रवासन मार्ग भी बदल सकते हैं। ये व्यवधान समय के साथ जमा होकर उन पारिस्थितिक संबंधों को नया आकार दे सकते हैं जो हजारों वर्षों में अपेक्षाकृत शांत परिस्थितियों में विकसित हुए थे।

यह समस्या केवल वन्यजीवों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर स्थानीय स्वदेशी समुदायों की आजीविका पर भी पड़ता है। कई आर्कटिक निवासी शिकार और मछली पकड़ने के लिए जानवरों की गतिविधियों पर निर्भर हैं। ध्वनि प्रदूषण इन जानवरों के व्यवहार को अप्रत्याशित बना सकता है, जिससे इन समुदायों के लिए जीवनयापन मुश्किल हो सकता है।

मानव-निर्मित शोर के प्रमुख स्रोत

शोध में पानी के नीचे के शोर के कई स्रोतों की पहचान की गई है, जिनमें वाणिज्यिक शिपिंग, बर्फ तोड़ने वाले जहाज (आइसब्रेकर), भूकंपीय सर्वेक्षण और अपतटीय ड्रिलिंग शामिल हैं। ये सभी ध्वनियाँ मिलकर एक लगातार ध्वनिक पृष्ठभूमि बनाती हैं जो पिछले दशकों में इस पैमाने पर मौजूद नहीं थी। भूकंपीय सर्वेक्षणों में समुद्र तल का नक्शा बनाने के लिए शक्तिशाली एयरगन का उपयोग किया जाता है, जो तीव्र ध्वनि स्पंदन पैदा करते हैं, जबकि ड्रिलिंग और शिपिंग से लगातार निम्न-आवृत्ति का शोर उत्पन्न होता है।

हालांकि, अध्ययन एक संतुलित दृष्टिकोण भी अपनाता है। डॉ. ब्लोंडेल ने इस बात पर जोर दिया कि आर्कटिक समुद्र में पूर्ण मौन न तो आवश्यक है और न ही उनकी टीम इसकी वकालत कर रही है। उन्होंने कहा, “स्थानीय लोगों द्वारा उपयोग की जाने वाली छोटी मछली पकड़ने वाली नौकाओं जैसे कुछ ध्वनियों का प्रभाव नगण्य हो सकता है।”

हर तरह का शोर हानिकारक नहीं

अध्ययन यह भी स्पष्ट करता है कि सभी प्रकार की ध्वनि समान पारिस्थितिक जोखिम नहीं रखती है। ध्वनि की आवृत्ति, तीव्रता, अवधि और समय यह निर्धारित करते हैं कि वह जानवरों के व्यवहार में हस्तक्षेप करेगी या नहीं। कुछ मानव-निर्मित ध्वनियाँ प्राकृतिक ध्वनिक वातावरण में घुलमिल जाती हैं और कोई नुकसान नहीं पहुँचाती हैं।

शोधकर्ताओं का कहना है कि कुछ मानव-निर्मित ध्वनियाँ बर्फ के पिघलने या टूटने की तेज पृष्ठभूमि के शोर की तुलना में बहुत कम होती हैं, या वे स्थानीय जानवरों की सुनने की क्षमता को प्रभावित नहीं करती हैं। इस सूक्ष्म दृष्टिकोण का उद्देश्य बेहतर नीतिगत निर्णय लेने में मदद करना है। लक्ष्य पूर्ण प्रतिबंध लगाना नहीं, बल्कि प्रवासन, प्रजनन या भोजन जैसे संवेदनशील समय के दौरान सबसे विघटनकारी गतिविधियों को सीमित करने के लिए लक्षित प्रबंधन करना है।

संक्षेप में, यह अध्ययन आर्कटिक में बढ़ते ध्वनि प्रदूषण के जटिल मुद्दे पर प्रकाश डालता है। यह बताता है कि कैसे मानवीय गतिविधियाँ और जलवायु परिवर्तन मिलकर एक शांत पारिस्थितिकी तंत्र को बदल रहे हैं, जिससे समुद्री जीवन और स्थानीय समुदायों दोनों के लिए गंभीर परिणाम हो सकते हैं। शोधकर्ता केवल समस्या की पहचान नहीं कर रहे हैं, बल्कि सूचित और लक्षित समाधानों का मार्ग भी सुझा रहे हैं।

FAQs

आर्कटिक महासागर में शोर क्यों बढ़ रहा है?

जलवायु परिवर्तन के कारण समुद्री बर्फ पिघल रही है, जिससे नए शिपिंग मार्ग खुल गए हैं। इसके अलावा, पर्यटन, अनुसंधान और औद्योगिक गतिविधियों में वृद्धि के कारण आर्कटिक महासागर में शोर बढ़ रहा है।

बढ़ते शोर का समुद्री जीवों पर क्या असर पड़ता है?

बढ़ा हुआ शोर समुद्री स्तनधारियों जैसे व्हेल और बेलुगा के संचार, नेविगेशन और शिकार करने की क्षमता को बाधित करता है। इससे उनमें तनाव बढ़ सकता है और उनके प्रवासन मार्ग बदल सकते हैं।

शोर बढ़ने के लिए कौन सी मानवीय गतिविधियाँ जिम्मेदार हैं?

वाणिज्यिक शिपिंग, बर्फ तोड़ने वाले जहाज, तेल और गैस की खोज के लिए भूकंपीय सर्वेक्षण और अपतटीय ड्रिलिंग जैसी गतिविधियाँ आर्कटिक में ध्वनि प्रदूषण के प्रमुख स्रोत हैं।

क्या आर्कटिक में हर तरह का मानव-निर्मित शोर हानिकारक है?

नहीं, अध्ययन के अनुसार सभी मानव-निर्मित ध्वनियाँ हानिकारक नहीं हैं। कुछ ध्वनियाँ, जैसे स्थानीय मछली पकड़ने वाली नौकाओं से आने वाली आवाज, प्राकृतिक पृष्ठभूमि के शोर की तुलना में नगण्य होती हैं और वन्यजीवों को प्रभावित नहीं करती हैं।

यह अध्ययन किस जर्नल में प्रकाशित हुआ है?

यह अध्ययन पीयर-रिव्यू जर्नल *npj Acoustics* में प्रकाशित हुआ है।

यह जानकारी केवल सामान्य जन-जागरूकता के उद्देश्य से प्रकाशित की गई है।

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